दफ्तर की भाग-दौड़ से रिटायर हो गए,
कमरा बदल गया और बैठक में आ गए,
स्टेयरिंग छूटा हाथ से विंडो सीट पर आ गए।
दुनियादारी, रिस्तेदारी में उलझे रहते थे,
अब चाय पे चाय पी कर पूरा पेपर पढ़ गए।
बच्चों को पी.टी.एम.से आ कर डांटा करते थे,
पोते -पोतियों का होमवर्क ख़ुद ही कर गए।
मन को टटोलते हैं किसी सीप की तरह,
खुशियों के मोती मिलते हैं और फिर बिखर गए।
वो आए और हाल मेरा पूछ ही लिए,
वरना तो हम टीवी की ओर मुड़ गए।
बस ताकते ही रहते थे परिवार के लोगों को,
अब बैठक बदल गया और बालकनी में आ गए।
अब गाड़ियों के हार्न और मोटरों की रफ़्तार,
देखते ही देखते हम मुस्कुरा गए।
साठ की उमर कब अस्सी की हो गई,
पता ही नहीं चला कब बुजुर्ग हो गए।।
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