मन का परिंदा
आज निर्भीक है
इस जमाने से
बंदिशों की बेड़ियों को
बड़ी मुश्किल से काटा है
शब्द चुभते नहीं
अब मुझे तन्हाई में।।
-दीप्ति त्रिपाठी
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