ये जमाना मुझको घर का चिराग कहा करता था
तब न जानू मतलब बस खुद पर नाज करता था
बड़े होते ही जिम्मेदारियों का भार मुझपर आया
समाज की बातों का तब मतलब समझ में आया
आज जोख़िम उठाकर घर का गुजारा कर रहा हूँ
खुद को जला कर पूरे घर में उजाला कर रहा हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X