अपने भविष्य के सपने बुनते हुए बच्चे
अपने भविष्य के सपने बुनते हुए बच्चे
कोई अपराधी नहीं है
न ही कोई आतंकी या खालिस्तानी हैं
ये बच्चे
देश को आगे ले जाने वाले
रथ के पहिए हैं
जो अपनी किताबों की दुनिया छोड़कर
बहुत मजबूरी में सड़क पर निकलते हैं
वे सूरज के घोड़े से भी तेज चल सकते हैं
उनके सपनों को
ऊंची उड़ान भरने से मत रोको
ये समुद्र की ऊंची लहरों
और चट्टानों को भी
भेद कर आगे निकल जाने का
सामर्थ्य रखते हैं
सत्ता की बर्बर लाठियां
इन्हें रोक नहीं सकती
क्योंकि उनके रक्त से
निकलते हैं कई न्यूक्लियर बम
जिसे झेल पाने की ताकत
संसार के किसी यंत्र में नहीं है
उनकी लगन और तपन से
वाटर कैनल और आंसू गैस
भाप बनकर उड़ जाएंगे
आसमान की अनंत खोह मे
छात्रों के धमनियों और शिराओं से
बहता हुआ रक्त
देश की धूर विरोधी दमन और नीति को
साफ कर रहा है
उनकी आवाज में
देश का संविधान बोल रहा है
जब संविधान बोलता है
तो सत्ता के हाथ पांव कांपते हैं
और वह झुकती है
उनकी आंखों से बहते हुए अश्रु से
धरती पसीजती है
इसे संभालो!
यदि नहीं सम्भाल पाये तो
शेषनाग का फन डगमगा सकता है
-दीपक शर्मा 'नवेन्दु'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X