हवा में तैर जाती है, तुम्हारी याद की खुशबू,
जगाकर छोड़ जाती है, कोई सोई हुई आरज़ू।
नयन में रूप का कजरा, तुम्हारा चैन लेता है,
तुम्हारी मंद मुसकानें, मुझे आवाज़ देती हैं।
(अंतरा 1)
सजाये शाम के साये, ढली जब रात आँगन में,
उतरी धूप सोने सी, तुम्हारी याद के वन में।
हवा का नर्म झोंका जो, मुझे छूकर गुज़रता है,
लगे कि साँस की वीणा, मधुर कुछ गुनगुनाती है।
(अंतरा 2)
मोहब्बत की इबादत में, झुकाया शीश है मैंने,
तुम्हें पाकर ज़माने की, भुलाई रीश है मैंने।
मगर जब दूर होती हो, तो यह सावन भी जलता है,
विरह की रात आँखों में, समंदर छोड़ जाती है।
(अंतरा 3)
तपस्या यह युगों की थी, मिला जो साथ है तेरा,
अँधेरे घर के कोने में, हुआ प्रभात है मेरा।
चले आना कि होठों का, निमंत्रण रोक ना पाना,
तुम्हारी चूड़ियों की धुन, मुझे पागल बनाती है।
(अंतरा 4)
तुम्हारा नाम आँखों की, ज़बाँ पर तैर आता है,
कि जैसे कोई प्यासा ही, नदी के पास आता है।
हृदय का काग़ज़ कोरा था, कलम तुमने उठाई है,
लिखी जो प्रेम की पाँती, वही कविता बन जाती है।
(अंतरा 5)
भले ही दूरियाँ लाखो, हमारे दरमियाँ आएँ,
मगर ये साँस का बंधन, कभी भी टूट ना पाए।
जिधर भी देखता हूँ मैं, तुम्हारा अक्स दिखता है,
तुम्हारी सादगी ही बस, मुझे जीना सिखाती है।
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