काग़ज़ के नोट आ गए आँचल की छाँव में,
सिक्के मचल रहे हैं भिखारी के पाँव में।
बचपन की वो पतंग वो सावन की मस्तियाँ,
अब ढूँढता हूँ ख़ुद को मैं मसरूफ़-ए-गाँव में।
दुनिया का समुंदर भी पार कर ही जाएँगे,
तैरेंगे हम बे झिझक मोहब्बत की नाव में।
रिश्तों की सब दलीलें यहाँ मात खा गईं,
कैसा अजब नशा था सियासत के दाँव में।
दौलत के इस जहाँ में मिला चैन ना कहीं,
इंसान बिक रहा यहाँ नोट के भाव में।
तन्हा सफ़र में कोई सहारा न मिल सका,
बहती रही है ज़िंदगी वक़्त बहाव में।
— दीपक प्रजापति 'अलक'
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