बदलती देख कर रंजिश, वो अपना रास्ता करते,
भरोसे का गला घोंटा, तो फिर वो और क्या करते?
चिराग़ों की तरह हम तो जले थे जिनकी राहों में,
उजाला मिलते ही आख़िर वही तो लापता करते।
अँधेरे बाँट कर हमको, वो ख़ुद को रौशनी कहते,
लहू से ही हमारे वो नया एक मोज़ज़ा करते।
मोहब्बत की गली में हाथ थामे जो चले कल तक,
वो आते ही कोई भी मोड़ चुपके से जुदा करते।
मुक़द्दर की लकीरों से बगावत लाज़मी थी अब,
वफ़ा के नाम पर वर्ना वो हमसे और दग़ा करते!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X