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नव-सृजन का बीज

                
                                                         
                            कुरुक्षेत्र की तप्त धरा पर, शोणित का जब सूख गया नद,
                                                                 
                            
चीख-पुकारें शांत हुईं सब, चूर हुआ वीरों का जब मद।
अस्थि-भस्म से पटी मेदिनी, मृत्यु-नृत्य विश्रांत हुआ था,
महानाश के उस तांडव का, कोलाहल अब शांत हुआ था।
उसी भस्म के मध्य खड़े थे, नटवर नागर कृष्ण कन्हाई,
दृष्टि करुणा-जल से पूरित, होंठों पर मुस्कान सुहाई।
कहा श्याम ने, "हे वसुंधरे! पीड़ा का अब अंत करूँगा,
इस श्मशान की सूनी छाती, नव-जीवन से आज भरूँगा।"
झुके श्याम उस रुधिर-भूमि पर, निज कर से सब शल्य हटाए,
एक बीज नूतन आशा का, उस घायल मिट्टी में लाए।
सींचा उसको प्रेम-सुधा से, नयन-नीर दो छलक पड़े जब,
फूटा अंकुर एक प्राण का, पुलकित होकर पत्र उगे तब।
वह पौधा था सत्य-धर्म का, नव-युग के नूतन विहान का,
महानाश की प्रलय-भूमि पर, फिर से सुंदर नव-निर्माण का।
द्वेष-दंभ के दहन मिटाकर, यह पौधा वटवृक्ष बनेगा,
छाया में जिसकी यह जगती, मानवता का मार्ग चुनेगा।
मुरलीधर ने दिया संदेशा, "अंत मात्र इक नया आरंभ है,
महानाश की उर-कंदरा में, पलता नव-सृजन का स्तंभ है।"
जब-जब यह धरती झुलसेगी, मानव के क्रूर प्रहार से,
तब-तब कृष्ण रोपेंगे पौधा, अपने पावन प्रेम-दुलार से।
-दीपक कुमार मिश्र
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3 महीने पहले

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