प्रस्तर के प्रासाद बनार,
हरित-धरा की चिता लाकर।
काट दिए वे वृक्ष घनेरे
उजड़ गए खग-कुल क डेरे।
नदियों का जल गरल नाकर,
बारूदों का ढेर लगार।
कृत्रिमता की इस बस्त में,
खो बैठा तू निज हस्तीमें!
सभ्यता के इस नग्न-नृत् में,
विनाशकारी मलिन कत्य में,
हे मानव, सच-सच बलाना!
सृष्टि का श्रृंगार मरा था,या भीतर इंसान मरा था?
स्वर्ण-रजत की खन-खन पीछे,
स्नेह-मूल्य गिर गए हैं नीचे।
रक्त ही अब है रक्त का प्यासा,
छल-प्रपंच का बिछा है पासा।
वृद्ध-नयन चौखट पर तरसें,
स्वार्थ-अग्नि के बादल बरसें।
संवेदना सुन्न पड़ गई है,
मानवता अब सड़-गल गई है!
रिश्तों के इस घोर पतन में,
निष्ठुर और पाषाण हुए मन में,
हे मानव, सच-सच बतलाना!
ममता का वह तार मरा था,
या भीतर इंसान मरा था?
यंत्रों की इस आपा-धापी,
सकल विश्व की सीमा नापी।
मस्तिष्क हुआ है तीव्र-प्रखर पर,
हृदय खड़ा है शून्य-शिखर पर।
रक्त सड़क पर गर बह जाए,
चित्र खींचने तू रुक जाए!
पीड़ित की पीड़ा न दिखती,
कैसी है यह अंधी तरक्की!
संवेदन-शून्य हुए इस युग में,
आभासी माया के मृग में,
हे मानव, सच-सच बतलाना!
करुणा का वह सार मरा था,
या भीतर इंसान मरा था?
-दीपक कुमार मिश्र
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