आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नदी किनारे आटे की चक्की...

                
                                                         
                            वो भी क्या दिन थे, जब
                                                                 
                            
मां के साथ नदी किनारे आटे की चक्की पर आटा पिसवाने जाते थे।
नन्हे नन्हे पांव पर माँ के साथ जाने की जिद होती थी।
थक जाने पर रुक जाना और माँ की डांट पड़ते पड़ते नदी पार करवा देना, बड़ा ही अच्छा लगता था।
पत्थरों से बना वो ऊबड़ खाबड़ रास्ते के किनारे बेरों से लदी झाड़ियां मन को अपनी ओर खींचती थी।
बेर लेने की इच्छा का माँ से जताना और खट्टे मीठे बेर और डांट एकसाथ खाना बड़ा ही अच्छा लगता था।
आटे की चक्की पर पहुँचना और वहाँ पर आम के पेड़ से लगा झूला झूलना ही आखिरी वजह होती थी आटे की चक्की पर जाने की।

---दीक्षा ठाकुर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर