वो भी क्या दिन थे, जब
मां के साथ नदी किनारे आटे की चक्की पर आटा पिसवाने जाते थे।
नन्हे नन्हे पांव पर माँ के साथ जाने की जिद होती थी।
थक जाने पर रुक जाना और माँ की डांट पड़ते पड़ते नदी पार करवा देना, बड़ा ही अच्छा लगता था।
पत्थरों से बना वो ऊबड़ खाबड़ रास्ते के किनारे बेरों से लदी झाड़ियां मन को अपनी ओर खींचती थी।
बेर लेने की इच्छा का माँ से जताना और खट्टे मीठे बेर और डांट एकसाथ खाना बड़ा ही अच्छा लगता था।
आटे की चक्की पर पहुँचना और वहाँ पर आम के पेड़ से लगा झूला झूलना ही आखिरी वजह होती थी आटे की चक्की पर जाने की।
---दीक्षा ठाकुर
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