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काग़ज़ की आत्मकथा

                
                                                         
                            मैं एक काग़ज़ हूँ,
                                                                 
                            
हां वो ही काग़ज़, जिसकी क़ीमत
किसी मामूली तराज़ू के बल पर
बेश कुछ किलो में होती है।

लेकिन किलो की क़ीमत से ज़्यादा
मेरा भाव तो उन पैमानों पर टिका हुआ है,
जिससे लोगों का भविष्य का चयन
चंद कुछ शब्दों के दम पर होता है।

पेड़ों से शुरू होती है मेरी कहानी
और खत्म होती है तुम्हारे घर में रखे तख्त पर;
कोई घसीटे अपनी क़लम मुझ पर
तो कोई बना डाले मुझे अस्त्र संजोरकर।

कोई बनाए मेरा हवाई जहाज़
तो कोई लिखे आत्मकथा मुझ पर
और कभी बरसात आन पड़े तो
मैं बन जाऊं एक कश्ती सुंदर!

ग्रंथों ने दी मुझे स्थान धार्मिक स्थलों पर
तो विद्या ने बढ़ाया मेरा सम्मान हर जगह पर;
मैं ही तो सुनता हूँ तुम्हारी आवाज़,
जब लिखते हो तुम अपनी व्यथा!

पर मैं कभी बूढ़ा नहीं होता
क्योंकि मैं हर सच को अपने सीने में रखता हूँ!
मग़र रहना है हर मन में अमर मुझे
क्योंकि मैं कागज़ हूँ, जो हर दौर में ज़िंदा रहता हूँ।
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2 महीने पहले

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