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मेरे भीतर दो आदमी

                
                                                         
                            मैं एक हूँ
                                                                 
                            
इतना तो निश्चित है
लेकिन
जब भी अपने भीतर उतरता हूँ,
एक नहीं मिलता
हां..वहाँ
दो आदमी बैठे हैं।
एक
धूल भरे पैरों के साथ
खेतों की मेड़ों पर चलता है
वह
फटी हथेलियों को पढ़ता है
जैसे वे
संविधान से भी पुरानी कोई किताब हों।
उसे
भूख दिखाई देती है।
उसे
अन्याय दिखाई देता है।
जब कोई किसान
अपनी आवाज़ ऊँची करता है,
वह उसके साथ
अपनी आवाज़ मिला देता है
उसे लगता है,
चुप रहना
सबसे बड़ा अपराध है
फिर
मैं वही नहीं रहता।
मेरे कंधों पर
एक पद आ बैठता है।

मेरी जेब में
एक पहचान-पत्र रख दिया जाता है
मेरे सामने
फाइलें खुलती हैं
कानून की धाराएँ
धीरे-धीरे
मेरी भाषा बन जाती हैं।
अब
वही भीड़
मुझे भीड़ लगती है।
वही नारे
शोर लगते हैं।
वही विरोध
अनुशासन के विरुद्ध दिखाई देता है।
मैं चाहता हूँ,
सब अपने-अपने घर लौट जाएँ।
जैसे
शांति
सिर्फ़ सन्नाटे का दूसरा नाम हो।

शाम को
जब वर्दी उतरती है,
पद नहीं रहता
तब
एक प्रश्न बचा रह जाता है
यदि
मैं उनकी जगह होता
क्या तब भी
चुप रहता?

नहीं।
शायद
मैं भी
उसी सड़क पर खड़ा होता।
उसी नारे में
अपनी साँस मिलाता।
उसी अधिकार को
अपना अधिकार कहता।
तब
मैं देर तक
अपने ही निर्णयों के सामने
खड़ा रहता हूँ।

धीरे-धीरे
मैंने जाना,
मनुष्य
सत्य का पक्षधर कम,
अपनी स्थिति का पक्षधर
ज़्यादा होता है।

कुर्सी बदलती है,
तो तर्क बदल जाते हैं।
स्थान बदलता है,
तो न्याय की परिभाषा बदल जाती है।

भूमिकाएँ
हमारे विचारों पर
वैसे ही चढ़ जाती हैं
जैसे बारिश में
कपड़ों पर गीलापन।
और हमें लगता है,
यही हमारा स्वभाव है।

मेरे भीतर का पहला आदमी
कहता है
मनुष्य
रोटी से पहले
सम्मान चाहता है।
उसकी आवाज़
उसका अंतिम अधिकार है
यदि वह भी छीन ली जाए,
तो बचता क्या है?

दूसरा आदमी
धीरे से कहता है
यदि
हर आवाज़
एक साथ उठे,
तो व्यवस्था कैसे बचेगी?
यदि
हर असहमति
सड़क पर उतर आए,
तो शासन किस तरह चलेगा?

दोनों
अपने-अपने तर्क रखते हैं
दोनों
झूठे नहीं हैं
दोनों
अधूरे हैं।

तभी
मेरे भीतर
एक तीसरा मौन जन्म लेता है
वह
न किसान है,
न अधिकारी
न शोषित,
न शासक।
वह
सिर्फ़ देखता है।

वह देखता है कि
कैसे
एक ही मन
परिस्थिति बदलते ही
अपनी भाषा बदल लेता है
कैसे
न्याय
कभी अधिकार बन जाता है,
कभी नियम।
कैसे
कर्तव्य
कभी सेवा होता है,
कभी शक्ति।

शायद
मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम
यह नहीं कि वह झूठ बोलता है
बल्कि यह है कि
वह हर भूमिका में
अपने सत्य को
अंतिम सत्य मान लेता है।

मैं अब भी
एक ही हूँ
लेकिन
मेरे भीतर
दो आदमी रहते हैं।

एक
दर्द से जन्मा है
दूसरा
दायित्व से।

मैं
अब किसी को
मारना नहीं चाहता।
न किसी को
चुप कराना चाहता हूँ।

मैं बस इतना चाहता हूँ
जब भी
मेरे भीतर का कोई आदमी बोले,
दूसरा
उसे सुनता रहे।
शायद
यही सुनना
मनुष्य होने की
सबसे कठिन साधना है।

- देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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