वर्षा तुम कितनी शीतल हो?
मेरे मन को अति भाती हो।
रिमझिम रिमझिम के गीतों में,
सातों ही स्वर दे जाती हो।।
लूं के गरम थपेड़ों में जब,
जीवन की बगिया मुरझाई।
ताप तपिस को झेल न पाए,
फिर बस याद तुम्हारी आई।।
हल्की सी बौछार चला कर ,
मानो केश झटक जाती हो।
वर्षा तुम कितनी शीतल हो,
मेरे मन को अति भाती हो।।
जब-जब कदम तुम्हारे बढ़ते,
जीने की आशा बढ़ती है।
सभी दिशाएं हंसने लगतीं,
पुष्प लता ऊपर चढ़ती है।।
जो तरु बदल गए पंजर में,
उनको नव जीवन लाती हो।
वर्षा तुम कितनी शीतल हो,
मेरे मन को अति भाती हो।।
जब जब मिलता हूं मैं तुमसे,
मन प्रफुल्लित हो जाता है।
जैसे नृत्य मयूरा करता,
मेरा मन हंसता गाता है।।
भरी गगरिया जल की लेकर,
तुम थोड़ा सा छलकाती हो।
वर्षा तुम कितनी शीतल हो?
मेरे मन को अति भाती हो।।
पैरों के पदचाप सुने तो,
दादुर कैसा बोल रहा है?
कब से हाय पपीहा प्यासा,
जीवन राह टटोल रहा है।।
कोयल बोले बोल सुरीले,
जब तुम बागों में जाती हो।
वर्षा तुम कितनी शीतल हो,
मेरे मन को अति भाती हो।।
-दौलत कुमार
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