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देखता हूँ.. (ग़ज़ल)

                
                                                         
                            जगत से नित्य मैं आवागमन को देखता हूँ
                                                                 
                            
मनुज में फिर भी चारित्रिक पतन को देखता हूँ

कभी धन के लिए करते गबन को देखता हूँ
कभी बिन जेब-झोले के कफ़न को देखता हूँ

मैं डरता हूँ, मिलन की चाह किससे क्या करा दे
क्षितिज पर जब कभी झुकते गगन को देखता हूँ

लहू दे कर शहीदों ने सँवारा था जो उपवन
सियासत में अब उस जलते चमन को देखता हूँ

लुटेरों और चोरों का समय अब लद गया है
प्रहरियों में ही चोरी के चलन को देखता हूँ

प्रगति से अब किसी की इस जगत में कौन ख़ुश है?
कि अब शुभकामना में भी जलन को देखता हूँ

कहीं है आग उदर की तो कहीं पर वासना की
कहीं जबरन हरण होते वसन को देखता हूँ

मनाता हूँ, वो भूले से भी सत्ता में न आएँ
जब उनके हर विषय पर विष-वमन को देखता हूँ

पिताजी और माँ के बा'द अब तो गाँव जाकर
कभी चौखट, कभी सूने भवन को देखता हूँ

निराशा के घिरें जब भी गहन घन हृद्-पटल पर
तभी कुछ दूर आशा की किरन को देखता हूँ
 
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एक महीने पहले

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