अल्हड़, अजीब अंदाज था उसका
क्यों कोई नहीं यहां उस सा
सोचा करती हूं शाम सवेरे
वो दोस्त नहीं जो साथ मेरे
चेहरा झट से पढ़ लेता वो
बढ़ बढ़ के नसीहत देता वो
मेरी यादों में डाले डेरे
वो दोस्त नहीं जो साथ मेरे
एक अरसा हुआ जब बिछुड़ गए
परछाई थे एक दूजे की, पर अलग हुए
अब तो बस बाकी है यादों के अंधेरे
वो दोस्त नहीं जो साथ मेरे
ज़िंदगी के हर पल में रहता था मौजूद
अब तो खयालों में ही है उसका वजूद
उड़ा ले गये जाने कहां वक्त के थपेड़े
वो दोस्त नहीं जो साथ मेरे
-चित्रा
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