हम मंच पर खड़े होकर,
बड़े-बड़े वादे दोहराते हैं।
"पेड़ लगाओ, जीवन बचाओ,
"सबको यही पाठ पढ़ाते हैं।
पर तस्वीरें खिंच जाने के बाद,
वो नन्हे पौधे सूख जाते हैं।
भाषण तो हवा में गूंजते हैं,
पर ज़मीन पर हाथ रुक जाते हैं।
हम कहते हैं "स्वच्छ हो देश हमारा,"
गंदगी अब कहीं नहीं फैलाएंगे।
बनाएंगे सुंदर गली-मोहल्ला,
स्वच्छता का नया दौर लाएंगे।
पर जैसे ही मोड़ कोई आता है,
हम कचरा चुपके से गिरा देते हैं।
अपने घर को चमकाने के चक्कर में,
पूरी सड़क को गंदा कर देते हैं।
ये कैसी अपनी मज़बूरी है,
जो कथनी और करनी में दूरी है।
जब तक खुद को नहीं बदलेंगे,
तब तक हर कसम अधूरी है।
नारों से अब कुछ न होगा,
अब सच में कदम बढ़ाना होगा।
जो कहा है हमने जुबां से
उसे सच में करके दिखाना होगा।
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