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भीड़ सगी नहीं

bheed sagi nhi
                
                                                         
                            शहर की सड़कों पर दौड़ता, ये चेहरों का दरिया है,
                                                                 
                            
पर सच तो ये है कि यहाँ हर शख़्स तन्हा है।
हज़ारों कंधे टकराते हैं, एक-दूजे के पास से,
पर कोई नहीं पूछता हाल, ज़रा से अहसास से।

ये तालियाँ जो गूँजती हैं, बस वक्त की मोहताज हैं,
आज तुम्हारे नाम की हैं, कल किसी और का आग़ाज़ हैं।
भीड़ का अपना कोई चेहरा, कोई ठिकाना नहीं होता,
मुश्किल में हाथ थाम ले, ऐसा इसका ज़माना नहीं होता।

जब सूरज ढलने लगता है, परछाइयाँ भी साथ छोड़ देती हैं,
ये भीड़ तो बस तमाशबीन है, रुख हवा का मोड़ देती है।
मत ढूँढना इसमें अपनों को, ये बस एक शोर है,
दिखती तो साथ है मगर, खींचती अपनी ही ओर है।

याद रखना 'अकेले चलना' ही असली पहचान है,
भीड़ का हिस्सा बनना तो बस एक आसान गुमान है।
जो खुद के करीब है, वही असल में जीता है,
वरना ये भीड़ तो बस, वक्त और वजूद को पीता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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