जीवन जलती बाती सा है ,
जलना होता हर आंधी में ।
हर आँधी की कोशिश रहती,
पाले वह पहले सा तम ।।
ज्योत बनी कब बन्धन बोलो,
वह तो बस डूबी रहती
जलना ही जीवन की मुक्ति
तुम मत जलता मेरे मन,
जीवन की घुघली राहों को, तुमने राह दिखाई जलकर
लगे कठिन जब भी पथ मुझको, तुमने सरल बनाया चलकर ।
बाती तुम प्रिय को भी प्रिय हो, अन्धकार के कोने में,
तुम जीवन में जलते रहना, प्रिय का तम हर लेंगे मिलकर ।।
खूब जलाये दीपक हमने, हर त्यौहार दीवाली में ,
चकाचौध यह रास न आई, भाया मन को सूनापन।
बन्धन बनती शीतलता है, अग्नि बनी है हरदम मुक्ति
अभी धरा पर तिमिर घना है, बाती मत होना मध्यम "।।
इस दीवाली, पंचमुखी बाती से बनकर, हम हर कोना ढूंढेंगे,
अनुभव कर दुखिया की पीड़ा, लायेंगे सब में शक्ति
खुद की खातिर सब जीते हैं, अपना तम सब हरते हैं,
अपनी पीड़ा पी लेंगे हम, कर दूजों की अभिव्यक्ति।।
जीवन नाम इसी को कहते, कभी विषम फिर होता सम
हर आँधी की कोशिश रहती, कर दे वह पहले सा तम ॥
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