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सुनते नहीं

                
                                                         
                            "सुनते नहीं "
                                                                 
                            

सुनते नहीं जमाने में बिन सुने चले जाते हैं,
ज़िन्दगी के जज्बात कुछ कहे चले जाते हैं।

ये माना कि बड़े मगरूर हो गये आजकल,
बेरहमी से सपने वो हमारे कुचल जाते हैं।।

मुकद्दर में क्या लिखा है शायद नहीं जानते,
सुनते नहीं बस वो अपनी बात कहे जाते हैं।

बड़ा नाम रोशन किया है तुमने इस शहर में,
सुनते नहीं कितने लोग बरबस खिंचे आते हैं

सुबह से शाम हो गई राह तकते हुए तुम्हारी
सुनते नहीं मिलने की लोग दुआ मनाते हैं।

मुश्किलों का दौर चल रहा यूं तो आजकल,
ज़िन्दगी के ख्वाब आकर मचल जाते हैं।।

बेरहमी से क़त्ल कर दिया उम्मीदों का मैंने,
मेरे सपने किसी ओर का ख्वाब सजाते हैं।

गरुर बढ़ने लगा है लोगों का ज़िन्दगी में,
जिंदादिली बिना सुने ही लोग भूल जाते हैं।।

सुनते नहीं ज़िन्दगी में अपनी भी बात लोग,
अपनी धुन में मस्त अक्सर भूल जाते हैं।

ज़िन्दगी आवाज देती मगर सुनते ही नहीं,
गुजर जाता है कारवां हम बदलते ही नहीं।।
-चन्द्र शेखर मार्कंडेय
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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