तपती सुखी धरती जब प्यास से व्याकुल हो जाती है,
चारों तरफ देखो फिर जीवन में नीरसता आ जाती है।
एक एक बूंद पानी की खातिर पंछी उड़ते फिरते हैं,
बादल आते हैं और इठलाकर फिर चले जाते हैं।।
घोर निराश सी मन में उपजी मन कोलाहल करता है,
चकोर स्वाति नक्षत्र की बूंद की खातिर प्यासा मरता है।
होती है जब रिमझिम बारिश मन मयूर नाचने लगता है,
हर जीव जंतु वनस्पति को नव जीवन फिर मिलता है।।
बाल बालाएं हर्ष प्रफुल्लित हो नृत्य करने लग जाते,
जीवन के सूखे पल भी अमृत बूंदों से त्रप्त हो जाते।
चारों तरफ हरियाली जैसे प्रकृति ने श्रंगार रचाया है,
हरे भरे वृक्षों को जैसे कोई सुन्दर परिधान पहनाया है।।
रिमझिम बरसती बूंदों में पेड़ों पर झूले पड जाते हैं,
इस बारिश के संग ही मल्हार शुरू फिर हो जाते हैं।
जीवन की है अमृत बेला कहीं बारिश कहर बन जाती है,
कहीं बाढ़ की चपेटे में कितने जीवन यह लील जाती है।।
बादल का पानी कहीं आंखें भिगोता कहीं सुख सार बन जाता है।
रिमझिम बारिश का जल तो बस अपनी रों में बहता जाता है।
आओ मेघा खूब बरसों एक कवि तुम्हारा अभिनंदन करता है,
तुम्हारी बूंदों के अमृत जल से फिर काव्य वंदन करता है।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X