"मेहनत आपकी रंग कोई ओर ले गया "
मेहनत करके कोई पछताता,
मजा कोई चुपके से ले जाता है।
महफ़िल सजाई किसने मेहनत से
लुफ्त कोई ओर उठा ले जाता है।।
इस दुनिया के है अजब खेल निराले,
कोई मेहनत करके भी पछताता है।
कोई सुघड़ सलोना चतुर सुजान
औरों की मेहनत का फल खाता है।।
जीवन में सब कुछ सीखा हमने,
मगर न सीखी ऐसी होशियारी।
कदम से कदम मिलाकर चलना
जीवन में सीखी हमने बस खुद्दारी।।
छल कपट और मतलब परस्ती
इस दुनिया का दस्तूर पुराना है।
मेहनत करता कोई इस दुनिया में
किसी को हाथ मलते रह जाना है।।
खाये गोरी का यार बलम तरसे यहां
कैसे सपना हमें दुनिया में सजाना है।
छल कपट और मक्कारी से बचकर
कैसे अपनी मेहनत का फल पाना है।।
सोचो जरा तुम ही बताओ अब
मेहनत का फल कोई ओर उड़ा ले जाता है।
मेहनत करने वाला भूखा मरे दुनिया में
महफ़िल का लुत्फ कोई ओर ले जाता है।।
चक्रव्यूह रचता है चालाक यहां
अभिमन्यु बलि अक्सर चढ़ जाता है।
अर्जुन के वाण भी निष्फल हो जाते हैं
जब गददारी का आलम बढता जाता है।।
प्रेम विश्वास सौहार्दपूर्ण वातावरण
नफ़रत इर्ष्या द्वेष वैर में बदल जाता है।
तब समझना मेहनत का फल फीका होता
चुस्त चालाक मककार सफल हो जाता है।।
जीवन की बगिया सूनी-सूनी सी होती
उसके फल चुरा कोई ओर ले जाता है।
मेहनत करने वाला हाथ मलता रह जाता
फल का मीठा स्वाद कोई और ले जाता है।।
-चन्द्र शेखर मार्कंडेय
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