मैं एक वृक्ष हूं
हां मैं एक वृक्ष हूं
सर्दी गर्मी धूप छांव
वर्षा सब सहता हूं ।
मुझमें भी जीवन है
अपना दुख न कह पाता हूं ।
हां मैं एक वृक्ष हूं ।
जीवन के कई सोपान मैंने देखें
बालपन से बुढ़ापे के अंतर देखे
फल फूल से लदकर रहना
और समय पर पतझड़ हो जाना
कितनी यादों को मैंने समेटा है।
हां मैं एक वृक्ष हूं ।
बचपन में नन्ही नन्ही कोपल आना
हवा के झोंको से अठखेलियां करना
बड़ा होते ही अपनी हरियाली से सबको लुभाना
फिर फूलों और फलों से लदजाना
बच्चों के ईंट पत्थर के प्रहार को सहना
क्या क्या नहीं देखा मैंने
हां मैं एक वृक्ष हूं ।।
फिर मेरी लम्बी लम्बी शाखाओं पर कुल्हाड़ी का वार
फिर भी मैंने नहीं की किसी से मनुहार
सब कुछ देखता रहा दुख सहता रहा
अपनी ठंडी छांव में सबको बुलाता रहा ।
न कोई जाति न कोई धर्म पूछा मैंने
फिर मानव मुझे दुख पर दुख देता रहा
हां मैं एक वृक्ष हूं ।।
मेरे कटे हुए भाग फिर से प्रफुल्लित होते रहे
फल और फल लकड़ियां मनुज को देते रहे
मानव का लोभ दिन प्रतिदिन बढ़ता रहा
अपने मन का क्रोध मुझपर उतारता रहा।
और मैं अविचल सा सब खुशी से सहता रहा
हां क्योंकि मैं एक वृक्ष हूं ।।
कभी मेरी छांव में आकर आराम करना
कभी मेरी सुन्दरता पर गीत गाना
कभी अपना साथी बनाकर मुझे गले लगाना
कभी मेरी हर डाली डाली पर घूम कर आना
सब कुछ देखा है मैंने
हां क्योंकि मैं एक वृक्ष हूं ।।
चिड़िया गिलहरी बगुला बन्दर
और ढेर सारे पक्षियों का बसेरा बना हूं ।
कितना अपना पन समझ कर मेरे पास आते हैं
और आकर जैसे मुझमें ही समा जाते हैं ।
किसी अच्छे बुरे इंसान में भी फर्क करना नहीं सीखा
हां क्योंकि मैं एक वृक्ष हूं ।।
आक्सीजन देकर कार्बन डाइऑक्साइड सोखता हूं
मैं ही अक्सर वर्षा का कारण बनता हूं ।
दुनिया की हर दवाई मुझसे ही तो बनतीं है ।
जड़ छाल पत्ते फल फूल बीज सब उपयोगी बनते हैं
हां क्योंकि मैं एक वृक्ष हूं ।।
महाजनों येन गता: स: पंथा
का पालन हमेशा ही करता रहा हूं ।
इसी लिए तो सबका आदर्श बनता रहा हूं ।
अपना जीवन देकर सबको सुख देता रहा हूं ।
हां क्योंकि मैं एक वृक्ष हूं ।।
न हिल डुल सकता है न चल फिर सकता हूं ।
क्योंकि अपनी जड़ें भूमि में प्रत्यारोपित करता रहा हूं
बढ़ रहा जैसे जैसे प्रदूषण उसे मैं ही झेलता रहा हूं ।
खुद रोगी होकर भी सबका इलाज करता रहा हूं ।
हां क्योंकि मैं एक वृक्ष हूं ।।
मानव की अतृप्त अभिलाषा का साक्षी बनकर
इस धरा के आंसू भी मैं देखता रहा हूं ।
जैसे जैसे मैं विलुप्त होता चला जा रहा है ।
ठीक वैसे ही वैसे रोगों की भरमार होती चली जा रही है।
अपना दुख किसी से नहीं कह पाता हूं ।
हां क्योंकि मैं एक वृक्ष हूं ।।
मैं वैसे तो सबके जीवन का आधार हूं ।
लेकिन फिर भी मैं कहीं न कहीं लाचार हूं ।
मैं वहीं भीष्म पितामह हूं जो प्रतिज्ञा पर अटल है
हां मैं अर्जुन के तरकस भी वाण हूं ।
हां क्योंकि मैं एक वृक्ष हूं ।।
बड़े बड़े योगी मुनियों ने मेरे नीचे ही तो तपस्या की है
मुझे बचाने के लिए वृत और त्योहार की सलाह दी है
जब लोग मुझे जल अर्पण करके मुझसे आशीर्वाद मांगते
मैं देव रुप में हर मनोकामना पूर्ण करने को तैयार हूं
हां क्योंकि मैं एक वृक्ष हूं ।।
राम कृष्ण गौतमबुद्ध महावीर हनुमान
सब मेरी छत्र छाया के आभारी रहे हैं ।
दुनिया के हर जीव जन्तु मेरे आंचल में पनपते रहे हैं
बादल भी आकर मुझसे दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं
जहां वृक्ष नहीं होते बिना बरसे ही चले जाते हैं ।
हां मैं एक वृक्ष हूं ।।
कितनी लम्बी कहानी है मेरी कह नहीं पाता हूं
सबके हर सुख-दुख में सबका साथ निभाता है ।
जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त भी मैं ही काम आता हूं
शुद्ध वायु देकर मैं सबके प्राण मैं ही बचाता हूं।
क्योंकि मैं एक वृक्ष हूं ।
नदी तट का बांध बनकर मिट्टी कटने से बचाता हूं
पर्वत पर हरियाली बनकर खूबसूरत बनाता हूं ।
नदियां झरने झीलें सब सूने से लगते हैं
जहां नहीं मैं प्रचुरता से पाया जाता हूं
हां क्योंकि मैं एक वृक्ष हूं ।।
ज्ञानियों का ज्ञान ऋषियों का तप
शूरवीरों के शौर्य में भी पाया जाता हूं ।
जीवन का हर सत्य मुझमें समाया रहता
इसीलिए ही तो मैं महान कहलाता हूं ।
हां क्योंकि मैं एक वृक्ष हूं।।
मुझमें भी जीवन है मैं भी सांसे लेता हूं ।
हर सुख-दुख को मैं भी महसूस करता हूं ।
मत उजाडों मुझे मुझको जिंदा रहने दो ।
क्योंकि इस धरती का श्रंगार मैं ही कहलाता हूं ।
हां मैं एक वृक्ष हूं ।।
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