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कौन हो तुम..?

                
                                                         
                            तेरी आहट से ये बगियॉं,
                                                                 
                            
क्यों 'बाग-बाग' हो जातीं..?
बड़े अदब से शीश झुकाकर,
कलियॉं क्यों खिल जातीं..?

क्यों तितलियॉं आगे-पीछे,
यह "ताज" समझ में आया...

कोयल के 'कुह-कू' गाने पर,
झरनों ने संगीत सजाया।
तुझे देख कर कठफोड़वे क्यों,
ठुक-ठुक कर त्रिताल बजाया..?

क्यों लगे नाचने मोर पपीहे,
यह "साज़" समझ में आया...

पूजा की थाल सजाकर तूने,
जब मन का दीप जलाया।
फिर करके फूलों की वर्षा,
जब तूने वह शंख बजाया।।

क्यों बजी घंटियां मंदिर की तब,
यह "राज़" समझ में आया...

शाम ढली, फिर रात चॉंदनी,
क्यों घूॅंघट धीरे से उठाया..?
तुझे देख कर मुई चॉंद ने,
क्यों मुॅंह बादल में छुपाया..?

क्यों तेरी जुल्फें आज नशे में,
यह "नाज़" समझ में आया...

तुझसे मिलने हूरें जन्नत की,
क्यों आज जमीं पर आईं..?
तुझे देख कर मृगनयनियां,
क्यों अपने नयन झुकाईं..?

क्यों लगी आग उस जन्नत में अब,
यह "आज" समझ में आया.
- चन्द्रकिशोर साहू "सुमन"
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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