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इक हलफनामा...

                
                                                         
                            ऐ वीराने-दिल, तू आ, गुलो-गुलजार कर दूंगा।
                                                                 
                            
तन्हाई में क्या जीना, तेरा घर-बार कर दूंगा।।

गर चुपके से हॉं कह दे तो मैं भी वादा करता हूॅं।
मिरे साये को भी तेरा, मैं ताबेदार कर दूंगा।।

क्या शानो-शौकत होगी, ऐशो-आराम भी होगा।
रख दोगे जिस जमीं पे पॉंव, जागीरदार कर दूंगा।।

सोने-चॉंदी के जरी-बर्क, तेरी जूतियों में होगी।
जड़के हीरे-मोती गजरे, तुझे उपहार कर दूंगा।।

भरे न मन फिर भी तेरा, तो कह देना इशारों में।
उठाके चॉंद-तारों को ही तुझपे निसार कर दूंगा।।

हवा को बाँध लाऊंगा सॉंसों की पहरेदारी में।
सूरज को तेरी चौखट का चिरागेदार कर दूंगा।।

गर चाहो तो लिख दूॅं मैं, फ़लक पे इक हलफ़नामा..?
जो भी मेरा, वो सब तेरा, यही इकरार कर दूंगा।।

"सुमन" ये दिल धड़कता है, तेरा ही नाम ले-लेकर।
अश्आरों में क्या जीना, दिल को अखबार कर दूंगा।।
- चन्द्रकिशोर साहू "सुमन"
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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