वो प्रेम, जो मैं कह न सका
मैंने उसे चाहा —
ना फूलों से, ना शब्दों से,
बस उस ख़ामोशी से जो जन्म-जन्मांतरों जितनी भारी थी।
मेरी आँखों में वो सब था
जो मेरे होंठ कहने से डरते थे,
क्योंकि इस जन्म में हर “ना”
जैसे किसी पिछले जीवन की प्रतिध्वनि बन जाती है —
जहाँ मैं देर से पहुंचा,
डर गया,
या टूटा हुआ था।
वो मुस्कुराती है — जैसे मेरी पीड़ा पर उगता हुआ सूरज।
और मैं वहीं रुका रह जाता हूँ,
क्योंकि मुझे लगता है —
शायद ये दुख मेरा कर्म है।
शायद कभी,
किसी पिछले जन्म में या स्कूल के गलियारे में,
कोई लड़की मुझसे कुछ कहना चाहती थी,
और मैंने नज़रें फेर ली थीं।
अब महसूस होता है —
वो पहिया फिर से घूम रहा है,
उन कर्मों का फल,
जिन्हें मैं याद नहीं कर सकता,
पर महसूस जरूर करता हूँ।
फिर भी…
मेरा दिल आज भी उसी के लिए धड़कता है —
उसे पाने के लिए नहीं,
बल्कि खुद को
इस डर और मौन के चक्र से मुक्त करने के लिए।
बुद्ध ने कहा —
दुख, आसक्ति से जन्मता है,
पर मैं क्या करूं
जब मेरा प्रेम ही मेरी आसक्ति बन जाए?
मैं नहीं चाहता कि वो मुझे पूरा करे।
मैं चाहता हूँ कि मैं उसे
बिना जलकर,
सिर्फ प्रेम से चाह सकूं।
मैं कहना चाहता हूँ:
“मुझे तुम पसंद हो,
पर पाने के लिए नहीं —
बल्कि उस ‘क्या होता अगर’ की जेल से खुद को आज़ाद करने के लिए।”
पर मेरे हाथ नहीं उठते।
मेरी आवाज़ पुराने दुख में छिप जाती है।
मेरा कर्म गहरा है,
पर शायद…
मेरा साहस और गहरा हो सकता है।
तो मैं ये कविता लिखता हूँ —
एक प्रार्थना की तरह,
एक शुद्धिकरण की तरह,
एक जागृति की तरह:
अगर वो ‘ना’ कह दे —
तो भी मैं गिरूं नहीं।
अगर वो चली जाए —
तो भी मैं बंद न हो जाऊं।
अगर फिर कभी प्रेम न हो —
तो भी मैं खुला रहूं।
क्योंकि ये प्रेम मेरा है।
और ये उपचार भी।
और शायद इस बार,
जब मैं पकड़ना छोड़ दूं,
तभी मैं सच में
मुक्त होना सीखूं।
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