कल तक मुसाफिर था,
मंजिल की आस थी।
अब पास सब कुछ है,
पर छूटी प्यास थी॥
वो चिंता नहीं, बेचैनी नहीं,
चेहरे पर मुस्कान है।
पर वो आग, वो जज्बा,
अब रूठा-रूठा सा लगता है॥
यह कैसा अहसास है,
मंजिल मिलने के बाद भी,
यह मन क्यों उदास है?
जीत भी अनजान है॥
कहा था किसी ने तब,
रास्ते से दिल मत लगाना।
पर मंजिल पे पहुँचकर जाना,
यादें ही बस सजाना॥
रास्ते के वो लोग, वो बातें,
सब छूटा-छूटा सा लगता है।
खुशी है मंजिल की मगर,
छूटने का एक अजीब अहसास लगता है॥
-चंचल
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