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लफ्ज़ रुका सा है-पुरानी डायरी से

                
                                                         
                            लबों पे मेरे लफ्ज़ रुका सा है।
                                                                 
                            
अश्क आँखों में ठहरा सा है।।

इक नजर देखने की जुस्तजू है।
तू मेरी खूबसूरत दुआ सा है।।

हर फूल इबादत के काबिल है।
हर फूल मुहब्बत का फरिश्ता सा है।।

चलो चाहतों के आज रंग उड़ाये।
देखो मौसम भी कुछ बदला सा है।।

गले मिलते ही मैं रो पड़ता हूँ।
अंदर मेरे जज्बातों का तूफ़ाँ सा है।।

कितना हसीं कितना खूबसूरत है।
घटाओं में चांद जो उलझा सा है।।

तेरी तस्वीर हाथों में लिये बैठा हूँ।
खयाल आज कुछ महका सा है।।

दर्द गैरों का भी दिल मे रखता हूँ ।
गुमनाम दिल दर्द का घरौंदा सा है।।
            -बृज मोहन सिंह बिष्ट
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53 मिनट पहले

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