आज वो महफिल में बेपर्दा होके आ गया।
कि चिराग महफिल मे वो संग लेके आ गया।।
बड़ी बड़ी आँखों में वो काजल लगा के आया।
कि कत्ल का सामान वो साथ लेके आ गया।।
क्यों आये तेरे मयखाने तक अब हम साकी।
नशा तो हम तक खुद ब खुद चलके आ गया।।
इक ख़ामोशी सी थी इस भरी महफिल मे मगर।
जाने कहां से ये धड़कनो का शोर उड़के आ गया।।
मिट जाएगी आज आँखों की प्यास भी शायद।
देखो समन्दर आज खुद पास बहके आ गया।।
नयी उमंगों से रोशन होने लगी है ये जिंदगी भी।
और साथ महफिल मे वो नये रंग सजाके आ गया।।
यू न बसायो उसे तुम हसीं ख़यालों मे गुमनाम।
मौसम वो तन्हाई का साथ अपने लेके आ गया।।
-बृज मोहन सिंह बिष्ट
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