हर सफर गुम है रास्ता गुम है
कौन जाने किसे राब्ता गुम है
ज़ुबान मुंह में है लगता ही नहीं
बात निकली मगर सदा गुम है
ढूंढने जिनको चले कहाँ पर हैं
हम किधर हैं वही पता गुम है
हर जरूरत में याद आया कोई
वर्ना भूले हैं जो वास्ता गुम है
हर दिलों में बेचैनी का आलम है
सभी अरमानों का फाख्ता गुम है
जाने किस दौर में आज जमाना है "वफ़ा"
अमन ओ चैन आशनाई ज़ाब्ता गुम है
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