छूने चले थे आसमां
पर ना रही ज़मीं पैरों तले
जाने आ पहुंचे कहां
जाने कहां को थे चले
रही चलती मुसलसल ज़िंदगी
पर हुआ मयस्सर कुछ भी नहीं
सपने गए अपने गए
ना सुख रहा ना दुःख ही कहीं
बस बुत सा बन कर रह गए
ना साँसें रहीं ना धड़कनें
छूने चले थे आसमां...।
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