बिछड़ गई मुझसे मेरी ज़मीं
बिछड़ गया मेरा आसमां
बिखर गया अब तो मेरा जहाँ
क्या ही करुँ अब मैं जाऊं कहाँ
जिसने संवारी मेरी ज़िंदगी
आँचल में थी जिसकी हर इक ख़ुशी
जिसने मेरे सुख दुःख को संग संग जिया
कहां उसको अब ढूंढूं जाऊं कहाँ
बिखर गया अब तो...।
मेरे सपनों को थी जिसने परवान दी
मेरी मुश्किलें हर पल आसान की
वही अब मुझे छोड़ है जाने कहां
उसे ढूंढने अब मैं जाऊं कहाँ
बिखर गया अब तो...।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X