कोशिशें लाखों करे मुझको गिराने की कोई।
कर्मरत हूँ, है न चिंता, इस जमाने की कोई।
जानता हूँ मैं हक़ीक़त, खेल सब शतरंज का,
है रची साजिश नई, मुझको फँसाने की कोई।
सब खिलाफत में खड़े हैं दुश्मनी ठाने हुए,
साथ मालिक फिक्र तब क्यों हो निशाने की कोई।
आज उसने आइना फिर से दिखाया सत्य का
बात सच्ची वो कही है अब ठिकाने की कोई।
मैं बहक सकता नहीं आँखें ये मेरी हैं सजग,
चालबाज़ी व्यर्थ होगी बरगलाने की कोई।
जुर्म की तफ़्तीश कितनी इस ज़माने में हुई,
जुर्रतें करता नहीं है, सच सुनाने की कोई।
-बृजेश पाण्डेय विभात
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