प्रेम का दीप आकर जला जाइए।
उर-सदन एक मंदिर बना जाइए।
धूप गुग्गुल सदृश आप की साँस से।
उर सुवासित रहे नित्य उच्छ्वास से।
मन सरोवर बना प्यास फिर भी सदा,
नैन-अरविंद सौरभमयी मृगमदा।
आरती के मधुर गीत गा जाइए।
प्रेम का दीप आकर जला जाइए।।
मेरा दिल एक मंदिर बना जाइए।।
कामनाएँ बहुत लोग मन में किए।
द्वार तो है खुला आपही के लिए।
आज भी है प्रतीक्षा चरण चाप की।
श्वास में गूँजती रागिनी आप की।
नूपुरों की मधुर ध्वनि बजा जाइए।।
प्रेम का दीप आकर जला जाइए।।
नैन के स्नेह की ज्योति ऐसी जले।
प्रीति उर के निलय में सदा ही पले।
आप के शीश कुंकुम सजे इस तरह।
रक्त सिन्दूर हो मूर्ति पर जिस तरह।
नाम प्यारा हृदय पर लिखा जाइए।।
प्रेम का दीप आकर जला जाइए।।
प्राण के द्वार वंदन कलश धर दिया।
नेह का थाल सज्जित समर्पित किया।
और कुछ अब नहीं होंठ मेरे कहें।
आप ही आप नयनों में मेरे रहें।
पूर्ण करने मिलन अर्द्ध आ जाइए।
प्रेम का दीप आकर जला जाइए।।
-बृजेश पाण्डेय विभात
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