"न जाने कौन-सा मधुर स्वर सुनकर लौट पड़ा मैं;
अपनी ही जीवन-यात्रा में,
स्मृतियों के मृत, फिर भी पूर्ण शून्य को
अपने भीतर लिए।"
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