मेरी जिह्वा,
सदैव मेरी ही ओर मुड़ी हुई,
दुर्वचनों का विष उगलता
फन फैलाए एक नाग है।
ज्यों ही कंठ का द्वार खुलता है,
वह दूसरों को डँसती है,
प्रहार करती है,
अपशब्दों की वर्षा करती है,
और निर्दोषों को भी
अपने विष का भागी बना देती है।
अब तो मुझे
स्वयं से ही भय लगने लगा है।
मैं विस्मय के पसीने में भीगा
एक काँपता हुआ प्राण हूँ।
और मैं...
मानो भीतर की अनंत अग्नि के बाद
शेष रह गई
एक जड़, सुन्न,
झुलसी हुई देह हूँ।
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