मस्ती में बहकर
जश्न मनाने की ज़रूरत नहीं कुछ भी;
कुछ खुशियाँ
ख़ामोशी में फूलों-सी
धीरे-धीरे खिलने दो।
जब उत्सव हद से गुज़र जाए,
तो कभी-कभी
ख़ुशी भी अपना अर्थ खो देती है।
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