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जीवन का समुद्र

                
                                                         
                            चाहे वर्षा कितनी ही मूसलाधार बरसे,
                                                                 
                            
समुद्र का पसीना कभी समाप्त नहीं होता।

चाहे सूर्य कितना ही दहककर
उसके जल को बार बार सोख ले,
समुद्र का लवणमय कफ़
कभी सूखकर समाप्त नहीं होता।

वैसा ही है जीवन का समुद्र।

दुःख की वर्षा निरंतर बरसती रहती है,
क्रोध का सूर्य निरंतर दहकता रहता है,
फिर भी विवशता का नमक
न कभी बदलता है,
न कभी विलीन होता है।
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2 महीने पहले

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