ठोड़ी पर हाथ टिकाए
कौतूहल में बैठा हूँ मैं, एक नन्हा-सा बच्चा।
मेरी आधी-मुंदी आँखें अभी भी
उन फूल की पंखुड़ियों-सी हैं
जो मेरे भीतर अब तक खिली ही नहीं।
समय के उस पार,
उसी ठोड़ी पर वही हाथ टिकाए,
मैं यूँ ही जड़ होकर बैठा हूँ,
एक एकांत-वृद्ध बनकर।
पंखुड़ियाँ झर चुकी हैं फिर भी,
उन्हें टूटकर गिरने नहीं दूँगा,
संध्या की कुतूहल-भरी दृष्टि के सम्मुख
उन्हें डंठल से जुड़े रहने दूँगा।
भोर की कोमल धूप,
अँधेरी रात का चाँदनी-छत्र,
और इनके बीच
यह दीर्घ, गहरी साँस लेता दोपहर का विराम,
इन सबको पार कर पाना मेरे वश में नहीं।
इस लंबी यात्रा के मध्य
विवश होकर संघर्ष करता मेरा जीवन
आज भी मुझे
मेरे ही भीतर अकेला छोड़ जाता है।
अब शेष हूँ मैं केवल
दीमक-खाई, वाचाल निस्तब्धता!
और यह मुक्ति की चाह में
पलायन करता हुआ मेरा पलायन,
स्वयं ही मुक्ति से वंचित,
असहाय होकर चलता रहता है।
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