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एक दिन जो होने का नाटक करता है

                
                                                         
                            सुबह चुपके से आती है,
                                                                 
                            
मानो देख ली जाएगी तो शर्मिंदा हो जाएगी—
एक बिल्ली, मासूमियत का अभ्यास करती हुई।

दोपहर तक उसके नाखून निकल आते हैं,
पिंजरे में टहलते बाघ की तरह—
इसे ही वह “उत्पादकता” कहती है।

और शाम?
फिर वही चूहा—
कुतरती हुई उन किनारों को
जो कभी भरे ही नहीं थे।

सूरज अपनी विराट दानशीलता का अभिनय करता है,
सोना उँडेलता है एक उदार राजा की तरह—
फिर खुद ही कंगाल होकर
केसरिया राख में बदल जाता है।

इतनी भव्यता,
सिर्फ एक तयशुदा पतन के लिए।

दो आहों के बीच
मुझे खुशी की एक खुराक मिलती है—
छोटी, नपी-तुली,
जैसे किसी दफ्तर में बाँटी जाती हो दया।

आशा आवेदन भरती है,
निराशा उस पर “लंबित” की मुहर लगा देती है।

समय गुजरता है—
न क्रूर, न दयालु—
बस पेशेवर उदासीनता के साथ,
जैसे मेरा होना
एक लिपिकीय भूल हो,
जिसे वह सुधारना भूल गया हो।

यादें टिमटिमाती हैं—
मोमबत्तियाँ नहीं,
एक जर्जर गलियारे के सस्ते बल्ब,
“लगभग” की बिजली से भनभनाते हुए।

दिन खत्म नहीं होते;
वे इस्तीफा देते हैं।
रात शुरू नहीं होती;
वह ड्यूटी संभाल लेती है।

और मैं—
एक दस्तावेज़ बिना हस्ताक्षर,
एक प्रतिध्वनि, जो प्रासंगिक होने का अभ्यास कर रही है—
जारी रखता हूँ हाशियों पर लिखना
उस जीवन की,
जो ज़िद करता है कि वह पूरा है।
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3 महीने पहले

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