प्रकाश की तपिश
और
अँधेरे की अंधता
के बीच,
दीपशिखा बनकर
धीरे धीरे
जलती हुई
एक प्राण-ज्योति।
तेल में उबलती
आशाएँ,
बाती बनकर
सुलगता हृदय,
लौ बनते
स्वप्न,
धुएँ में
आँखें मलती
स्मृतियाँ।
दिन भर
जलती परछाइयाँ,
रात की
आर्त साँसें।
मोम की तरह
पिघलता समय,
राख को
चूमती धरती।
प्रकाश और
अँधेरे की
दहलीज़ पर,
क्षण भर के
दीप।
अपनी ही लौ में
अपना अर्थ
लिख भी न सकने वाले,
चुपचाप
अपने भीतर ही
अपनी पूरी उम्र
जलाकर समाप्त हो जाने वाले।
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