“चाहिए भी, न चाहिए भी,
दोनों हाथ खींचते हैं;
दो नन्हीं चिड़ियाँ,
एक ही आत्मा को अपनी ओर खींचती हैं।
सद्गुणों के आकाश में प्राण,
और दुर्गुणों की धरती पर देह;
हर बीतते क्षण के साथ
यह अंतर्द्वंद्व और कसता जाता है।
बायाँ और दायाँ
सदा डोलते, काँपते, क्षीण होते हैं;
और मैं,
बस एक पतली-सी
मध्य-रेखा हूँ
उनके बीच!”
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