आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दीन, अहम्!

                
                                                         
                            “चाहिए भी, न चाहिए भी,
                                                                 
                            
दोनों हाथ खींचते हैं;
दो नन्हीं चिड़ियाँ,
एक ही आत्मा को अपनी ओर खींचती हैं।

सद्गुणों के आकाश में प्राण,
और दुर्गुणों की धरती पर देह;
हर बीतते क्षण के साथ
यह अंतर्द्वंद्व और कसता जाता है।

बायाँ और दायाँ
सदा डोलते, काँपते, क्षीण होते हैं;
और मैं,
बस एक पतली-सी
मध्य-रेखा हूँ
उनके बीच!”
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर