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भीगी गठरियों का गधा

                
                                                         
                            मेरा जीवन मानो एक गधा बन गया है,
                                                                 
                            
जो भौतिक जीवन की पीठ पर
आध्यात्मिक अनुभूतियों की भीगी हुई गठरियाँ ढो रहा है।

भीतर का विद्रोह,
भीतर की पैनी आलोचना,
बाहर आते आते
एक कायर की चुप्पी बनकर
बिखर जाती है।

आख़िरकार,
मैं स्वयं ही
एक संपूर्ण विरोधाभास हूँ,
आध्यात्मिकता और भौतिकवाद के
अनवरत द्वंद्व से जन्मा
एक जीवित प्रतिरूप।
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2 महीने पहले

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