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बच्चों के नाम पर दुकान

                
                                                         
                            मेरे गाँव में
                                                                 
                            
एक पिटारी-दुकान वाला था।
उसकी रोज़ी-रोटी
बच्चों को छलकर चलती थी।

आज लगता है,
हमारे लगभग 99% बाल-साहित्यकार भी
वैसी ही पिटारी-दुकानें सजाए बैठे हैं,
जहाँ बच्चों के भोले विश्वास को बेचकर
साहित्य से अपनी जीविका कमाई जाती है।
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2 महीने पहले

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