दुःखों को एक-एक कर छुओ,
उनके नाम लो,
उनकी धूल को उँगलियों पर सहेजो।
फिर पूछो स्वयं से:
क्या मनुष्य का जीवन एक लंबी निरुपाय प्रतिध्वनि नहीं?
क्षणों की सीढ़ियों पर चढ़ता, क्षणों की सीढ़ियों से उतरता, यह अल्पायु अस्तित्व,
साँझ की किरण पर ठहरी ओस की बूँद-सा।
फिर भी,
इसी नश्वरता के शिखर पर कौन रख जाता है
आनंद का वह पुष्प?
किस अदृश्य माली की इच्छा से वह खिल उठता है
इतना उजला, इतना सुगंधमय,
कि समय की कठोर उँगलियाँ भी एक पल के लिए मुलायम पड़ जाती हैं।
यही तो उसका सौंदर्य है,
कि वह चिरस्थायी नहीं;
यही उसकी दीप्ति है,
कि वह विलुप्त होने के लिए ही खिलता है।
और शायद
जीवन का समूचा रहस्य भी इसी में छिपा है:
नश्वरता के माथे पर अनश्वरता का एक क्षणिक फूल।
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