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तेज़ लहरों से डरना क्या

                
                                                         
                            हद जान जिंदगी की अहद से गुजरना क्या
                                                                 
                            
थक हार मान राहे सफर में ठहरना क्या

खुद में ही टूट कर भला खुद में बिखरना क्या
सच जान कर भी दुनिया का सच से मुकरना क्या

देता नहीं है साथ किसी का कोई पता
उम्मीद करना क्यूँ किसी से आहें भरना क्या

मिलता वही है रब ने लिखा जो नसीब में
पा क्या लिया खो क्या दिया ये जान करना क्या

माना कि दूर है अभी शबे ज़िंदगी सहर
मायूस औ उदास हो बन अश्क झरना क्या

आसान रहगुजर रही कब "जिंदगी" भला
कठिनाइयों से भाग दहर से उबरना क्या

तुमको ही पार करनी भँवर जिंदगी "सुदामा"
लहरें हैं तेज कितनी उठी सोच डरना क्या

©️®️विनोद सिन्हा "सुदामा"

अहद-दृढसंकल्प
दहर-समय काल
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3 वर्ष पहले

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