पीर हुई पहाड़ सी,
दुःख नदी सा बह रहा।
दिल धरा का रूप धर,
कचोट सब सह रहा।
तीव्र गति उड़ाकू मन,
पृष्ठ में ले सिलवट रहा।
इच्छाओं का अनंत क्षितिज,
शून्य में सिमट रहा।
क्लेश वायु रूप धर,
बन तूफ़ान बह रहा।
कच्ची काया का महल,
खंडहर होकर ढह रहा।
न नाम का उल्लास रहा,
न डर लगता बदनामी से।
क्षत-विक्षत अवयव हुए,
बुढ़ापे की सुनामी से।
रोगों के दरवाज़े से,
निधन दस्तक दे रहा।
उम्र याद दिला रही,
जीवन से वादा कहाँ?
कौड़ी-कौड़ी जिन्हें दिए,
गिन रहे वो मेरी सांस।
कुछ दिनों का मेहमान कह,
उड़ा रहे सब परिहास।
अभाव दरकिनार कर,
प्रभाव बांटे जा रहे।
अपनी-अपनी पसंद के,
हिस्से छांटे जा रहे।
कुछ भी अपना नहीं,
सत्य मन में पल रहा।
कल का परिदृश्य सोच,
दिल आज दहल रहा।
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