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क्या खता मुझसे हुई

                
                                                         
                            क्या ख़ता मुझसे हुई, संदेश आना बंद है।
                                                                 
                            
नेट काम नहीं कर रहा, या मोबाइल पाबंद है?
टूट रहा है घरौंदा, विश्वास भरे मेरे ख़्वाब का,
रातों से सोया नहीं, इंतज़ार में जवाब का।
तन्हा रहता हूँ मैं, अपनों की इस भीड़ में,
निहारता अनंत को, बैठे-बैठे नीड़ में।
उड़ गया हर पखेरू, इस वृक्ष के हर नीड़ से,
हवा भी अब रूठ गई, मेरे दिल की पीढ़ से।
गिरगिट जैसे रंग जो बदले, संबंध माने व्यापार
वफ़ा, बेवफ़ा, प्यार, दिल्लगी... सब होते बेकार,
— समर निःशेष

  

   
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2 घंटे पहले

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