बैठती जब झरोखे पास
वाकया एक होता खास
चीं चीं, करती एक गौरैया
चिढ़ाती मुझे कह खेवैया
कहती क्यों हुंई निराश
कंक्रीट तरु बनाया वास
कर स्वयं को चकनाचूर
बने भौतिकवादी भस्मासुर।
हमारा था तेरे संग जीवन
हुआ दुभर अब सहजीवन
चुगा करती, कीट,पतंग अन्न
निवास, निर्वहन या प्रजनन
फुदक-फुदकर, घर आंगन
मैं तुम संग रहती थी मगन
मान निज संरक्षक विभूति
पाकर अपनापन अभिभूति।।
मनुष्य को मान परमविश्वस्त
सोच, सुरक्षित मुंडेर दरख़्त
खपरैल घर से थी प्रीति
पालने हेतू निज संतति।
आती छोड़, अपनों की भीड़
प्रजनन हेतू , बनाने नीड़
घोंसले बनते बिना मलाल
थे उपलब्ध डंठल पुआल
रोकर सुनाती निज दुखड़ा
भोजन का प्रस्ताव ठुकरा
मित्र पशु-पक्षी से हुए दूर
प्रदूषित कवच से मजबूर।
आंगन,दरख्त,न खपरैल घर
हुआ तुम संग, रहना दूभर
न छोटे पेड़, न बची झाड़ियां
जहर उगलते,उद्योग,गाड़ियाँ।
पृथ्वी-जीवन बन चुका मरू
बने गगनचुम्बी, कंक्रीट तरू
अन्नों में रसायन का अंबार
बढ़ी ध्वनितरंगे,धुम्रीत संसार।
न खाने को बीज,पीने को पानी
असंभव बितानी संग जिन्दगानी
खोजने हेतु सुरक्षित ठौर
हम भटक रहे हैं , चहुंओर
सोचने पर मुझे कर मजबूर
उड़कर चली गई, वो दूर
शिकायत, संग कर गई सावधान
प्रदूषण मुक्ति मात्र निदान।।
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