जैसा मेरे नाम से जाहिर
इन अवगुणों का हूं साहिर
बेगैरत, निर्लज्ज बेशर्म
कहो हठी ढीठ , निर्मम।।
मैं बेहया मैं हुं थेथर
उदंडता ,धृष्टता मेरा नेचर ।
रहूं पादप या बनूं विशेषण
थेथरोलाजी मेरा संश्लेषण।।
मैं पादप , रुप में प्यारे
मिलता नमी, नद्य किनारे।
गुलाबी बैंगनी रंग के फूल
हरी पत्तियां, झाड़ी-झूल।
परिस्थितियां हो प्रतिकूल
नष्ट नहीं होता समूल।
भले ज़हरीला मेरा कूल
बाह्य औषधीय रुप कबूल ।।
पाया जिसने मेरा स्वभाव
गुणधर्म मेरा या हावभाव।
नवाजे जाते जो मेरे नाम
हो जाते हैं वो बदनाम ।।
अपसंस्कृतियों का मैं रावण
अतिस्वतंत्रता, मेरे कारण।
छिछोरापन ,कुतर्की बखान
अभद्र अशिष्टता का पाखान ।।
मुंहफट, उदंडी आवरण
लोग किए जा रहे वरण।
बेहया मिलते डगर डगर
हरेक घर हुआ थेथर घर।।
-विजय बहादुर तिवारी
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