पुरुष… और वो
वो चाहती है कि पुरुष उसके हिसाब से चले,
और पुरुष चाहता है कि वो उसके हालात समझ ले…
उसके लिए प्यार — एहसास है,
पुरुष के लिए — एक फ़र्ज़ है…
जिसे निभाते-निभाते वो खुद ही खुद से दूर हो जाता है।
तब वो पूछती है— “तुम बदल क्यों जाते हो…?”
और तब पुरुष सोचता है—
शायद उसने मुझे समझ लिया होता...
वो लफ़्ज़ों में यकीन ढूँढती है,
पुरुष ख़ामोशी में घर बनाता है।
वो “ध्यान” माँगती है, पुरुष “जिम्मेदारियाँ” उठाता है।
उसे शक होता है देर से घर आने पर,
पुरुष को फिक्र होती है कि चूल्हा जलता रहे।
वो सवालों में उलझी रहती है,
पुरुष हालातों में उलझा रहता है।
वो कहती है— “सच क्यों नहीं बताते?”
पुरुष सोचता है, अगर सच कह दूँ,
तो उसका सुकून बिखर जाएगा।
बस इन्हीं उलझनों के बीच दोनों के दरमियाँ
ख़ामोश दूरी बन जाती है।
पुरुष होना हुकूमत नहीं,
त्याग है, जो हर ख्वाब गिरवी रखकर
परिवार की मुस्कान खरीद लाता है।
और “वो”… शायद कभी समझे—
कि जिसे वो “बदलना” कहती है 'Anvit'
वो दरअसल एक आदमी का
धीरे-धीरे ज़िम्मेदार बनना होता है।
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